Monday, April 15, 2024

अनिल पांचाल सेवक

*प्रेषित है......*
             👇 *मां*👇

*••••गिरावट ना मिलावट....*
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*दुनिया में कच्चे रंगों वाली सजावट देखी,*
*रिश्तों के बीच मखमली बनावट भी देखी।*
*बच्चों की आंखों में आंसू ओर मां मुस्कुराएं,*
*दुलार में उसके न कभी कोई गिरावट देखी।।*
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*पिता के डांटने पर तेरी वो बगावत देखी,*
*मेरी मुसीबतों में तेरी अकुलाहट भी देखी।*
*वर्षों से महसूस किया है मैंने मां के प्यार को,*
*उसकी स्नेह में कभी न कोई मिलावट देखी।।*
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*अनिल पांचाल सेवक* ✍️
......9993152064.... 
*विचार क्रांति मंच उज्जैन*
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सुशील चन्द्र बाजपेयी

*मां*

*अंतस्तल की आकुलता को*
*देख रहे हैं नभ के तारे।*
*निविड़ निशा की  नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*सब कुछ सूना सा लगता है।*
*प्रतिपल व्यथा भाव जगता है।*
*कोई दस्यु सदृश ठगता है।*

*रोम रोम कंपित हो जाता,*
*किसी अनागत भय के मारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*मेरे इस एकाकीपन में।*
*उद्वेलन हो रहा है मन में।*
*कंटक से चुभते हैं तन में।*

*बांध नहीं पाते हैं क्षण भर,*
*जगती के संबंध यह सारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*जो तुम हो पाये नहिं अपने।*
*क्या होगा बुनकर के सपने।*
*छोड़ न देना मुझे तड़पने।*

*मेरे नष्ट प्राय जीवन को,*
*बिना तुम्हारे कौन संवारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*अनाद्यंत इस जग माया में।*
*त्राण तुम्हारी कर छाया में।*
*मोह नहीं नश्वर काया में।*

*मुझमें आत्म ज्योति बन चमको,*
*अंधकार में हों उजियारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*श्वांस श्वांस है ऋणी तुम्हारी।*
*भ्रमित हुआ मैं मति थी मारी।*
*दिन क्या? एक एक पल भारी।*

*कर अविलम्ब कृपा मेरी मां,*
*नष्ट करो त्रय ताप हमारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*सुशील चन्द्र बाजपेयी*
*लखनऊ (उ.प्र.)*

अमिता अनुत्तरा

मुझे अच्छा नहीं लगता
मेरी मां की उमर का बढ़ना 
अब मैं बूढ़ी हो रही हूं न 
उसका ये कहना 
मुझे अच्छा नहीं लगता ।
सूरज से पहले 
अम्मा को उठते देखा है 
पूजा की थाली , कंकू रोरी
रामायण की चौपाई
मैंने तो अम्मा में ही देखा है ,
लेकिन झटके से मेरी अम्मा 
अब उठ भी ना पाती है 
जब सहलाती है अम्मा 
अपना दर्द भरा घुटना 
मुझे अच्छा नहीं लगता ।
मेरी मां की उमर का बढ़ना 
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
चंदा की शीतलता को मैने तो 
अपनी अम्मा के हाथों में पाया है 
दुनिया की चालाकी में 
कैसे अपनी जगह बनाऊं 
अम्मा ने बातों ही बातों में 
समझाया है ,
सुख में ,दुख में रहने की 
अब तो आदत सी हो गई है 
लेकिन अम्मा बिन तेरे रहना 
मुझे अच्छा नहीं लगता ,
मेरी मां की उमर का बढ़ना 
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
                    अमिता अनुत्तरा

Sunday, April 14, 2024

शिल्पी मजूमदार

याद आती है मां
तुम कहा चली गई हो माँ 
तुम्हारी बहोत याद आती है माँ ।
पता नही ये एक एक पल
कैसे बीते तुम्हारे बाद
तुम्हारे साथ हंसना, रोना
तुम्हारा डांटना, तुम्हारा समझाना
बहुत याद आता है माँ ।।
कितना वक्त हो गया तुम्हे देखा नही,
तुमसे मिली नही, हाथो से खिलाया नहीं
सबकुछ बहुत याद आता है माँ ।
मुझे याद है तुम्हारा संघर्ष
कैसे तुमने काटा एक एक वर्ष
पापा के जाने के बाद
तुमने हमे कैसे बड़ा किया
सबकुछ बहुत याद आता है माँ ।
रिश्तों का पाठ तुमने पढ़ाया,
दुनियादारी तुमने समझाया
उठना ,बैठना ,कहना, सुनना,
सब तुम्हिने तो सिखाया ।
अब दो पल बांटने को तुम हो नही
तुम कहा चली गई हो माँ
तुम्हारी बहुत याद आती है माँ । 

✍️
शिल्पी मजूमदार

श्री मती ज्योति किरण चंद्राकर

माँ
कितनी ममतामयी होती है मां ।
अपनी हर गम छिपा लेती है मा।
धरती सी सहनशील।
अंबर सी विशाल होती है मां।
 त्याग ,बलिदान ,समर्पण की मूर्ति है मां। 

अपनी संतानों के लिए हर कुछ अर्पण करती है मां ।
सबसे बड़ी पथप्रदर्शक है मां ।
जीवन के सारे दुख हारती है मां ।
कितनी ममतामयी होती है मां ।
अपनी हर गम छिपा लेती है मां ।

© श्री मती ज्योति किरण चंद्राकर 

श्रीमती हासीरानी बैनर्जी

" माँ "                   

जननी जन्म भूमिश्च, 
                  स्वगधपि गरियसी, 

माँ है तो हम है, 
             माँ नहीं तो हम नहीं। 

भूमि है तो अन्न है, 
              भूमि नहीं तो अन्न नहीं। 

माँ गया, काशी, वृन्दावन है, 
      माँ ही शिक्षा, धर्म, कर्म, मर्म है। 

माँ प्यारी माँ न्यारी, 
                  माँ ही पवित्रता है। 

माँ ही शीतल,सरल, स्वच्छन्द है, 
      माँ ही सुबह, शाम, आनंद है। 

माँ ने हमें धर्म का पाठ पढ़ाया, 
 
माँ ही तो जीने का रास्ता दिखाया। 

मातृ दर्शन से दुख दुर हो जाता है, 

 मातृ दर्शन से सभी तीर्थ हो जाता है। 

माँ शक्ति साधन हमारी, 
     माँ ही तो है संसार सारी।

      रचयिता -श्रीमती हासीरानी बैनर्जी 
      सहायक शिक्षिका 
      आश्रम शाला परसदा खुर्द 
      विकास खंड छुरा 
     जिला गरियाबंद छत्तीसगढ़

भगवान दास शर्मा "प्रशांत"

*शीर्षक :मां*

मां तुम ही हो शक्ति स्वरूपा,
सम्पूर्ण सृजन आधार हो।
तुमसे ही है घर की शोभा,
करुणा वात्सल्य अवतार हो।।

बच्चों की तुम प्रथम शिक्षिका,
बच्चों के हित अड़ जाती हो।
तभी तुम कहलाती जगत में,
बच्चों की पालक औ रक्षिका।।

प्रतिमूर्ति हो सहनशील की,
सब तकलीफे सह लेती हो।
लोगों की खुशियों की खातिर,
चुपके से तुम सह लेती हो।।

प्रेम समर्पण भाव में डूबी, करुणामयी बन जाती हो। जब भी आता कठिन समय तो,
धैर्यवान धरा बन जाती हो।।

अपने बच्चों की खातिर तुम,
मौत से भी लड़ जाती  हो।
सदाचार मूल्यों की पोषक,
बच्चों को सदमार्ग दिखाती हो।।

मां धरणी जैसा है रूप तेरा,
बन क्षमाशील सह जाती हो,
 मन मे नहि रखती बैर द्वेष,
सदा सबकी प्रिय बन जाती हो।।

मां तुम जैसा दूजा नहि कोई,
नश्वर इस सकल संसार में।
ईश्वर की अद्भुत रचना मां,
सकल सृष्टि सृजन के सार में।।

भगवान दास शर्मा "प्रशांत"
इटावा उत्तर प्रदेश दूरभाष: 9457097 599 
ईमेल: bhagwandas.das@rediffmail.com

प्रणव प्रियदर्शी

याद आती है माँ

जब कभी
जिंदगी को बेअदब बोझ समझ
जीने लगता हूँ
और हीनता का शिकार होकर
निराशा के भँवर में फँसने लगता हूँ
याद आती है माँ!
जो नौ महीने तक पूर्ण सजगता से
अपनी संतान का बोझ ढोने में ही
अपने अस्तित्व की गरिमा समझती है।

माँ कभी नहीं कहती
मैं कोई बोझ ढ़ो रही।।

जब कभी
अनचाही परिस्थितियों के
पंजे में पड़कर छटपटाने लगता हूँ
और अपनी पीड़ाओं में 
पिघलकर जमने लगता हूँ
याद आती है माँ!
जो अपने बच्चे को जन्म देते समय
प्रसव की पीड़ा से छटपटाती हुई
वात्सल्य में निमग्न हो जाती है।

माँ कभी नहीं सोचती
मैं “माँ” क्यों बनी।।

जब कभी 
किसी की ललकार
या छोटी-छोटी बातों से चिढ़ने लगता हूँ
और अपनी सहनशीलता से उखड़
आक्रोश में आ जाता हूँ
याद आती है माँ!
जो अपने नवजात बच्चे के
रोने में छिपी ललकार देख
उससे लड़ने नहीं लगती
बल्कि सभी काम छोड़ उसके पास आती है
और चेहरे पर बिना किसी शिकन के
उसे अपनी गोद में समेट लेती है।

माँ कभी नहीं ऊबती 
न ही अपने मातृत्व को कोसती।।

जब कभी 
चारों ओर फैले 
शिकारी जाल में उलझ जाता हूँ
और भूत-भविष्य की चिंता में
रातभर जगा रह जाता हूँ
याद आती है माँ!
जो अपने बेचैन बच्चे के सिरहाने में बैठ
उसे लोरी सुना सुलाया करती है।

माँ कब सोती-कब जाग जाती है
यह सिर्फ वही जानती है।।

- प्रणव प्रियदर्शी
राँची, झारखण्ड
मोबाइल नंबर ः 7903009545, 9905576828
ईमेल ः pranav.priyadarshi.pp@gmail.com

बबिता सिंह

माँ

सोचती हूँ माँ 
तेरे बिना इस धरा का क्या होगा
 तू न होगी, तो शायद खुदा भी ना होगा।
तूने तो सबको है बराबर  दिया,
पर किसने क्या लिया 
 यह किस्मत की बात है।

 तूने  हर खुशी अपने बच्चों में मानी,
 मत्सर के कारण हुई ममता बेगानी।
बिन तेरे होली अब नहीं जमती
 तेरे सिले हुए कपड़े बाजारों में कहाँ मिलती ।
कपड़े पहनाकर तेरा हसरत से निहारना 
किसी की औकात नहीं ऐसे खुशियों को बाँटना।


तेरी रोटी की मिठास भी तो गजब थी 
खाने का स्वाद,रुचि भी तुम्हारे प्रेम से ही थी।
 ईश्वर अगर बैठ जाए इस धरा पर आकर 
खुश हूँ माँ निश्चय ही तुमको पाकर।
 क्योंकि उसने जो दिया हाथ बढ़ाकर,
 तुमने सारा भर दिया झोली में लाकर।


तेरा ऋण तो कोई भी नहीं चुका सकता, 
ना करने वालों का खुदा भी नहीं हो सकता।
 रब से ज्यादा है तेरी रहमत की ताकत
 खुदा भी विवश होगा देख तेरी बगावत 
तेरी निश्छलता पर करूँ मन समर्पण
 तेरी ही दुआ से धन्य रहे जीवन
 तू स्वस्थ रहे, जिए सौ साल तेरी ममता पाकर बनूँ मालामाल।

बबिता सिंह 
हाजीपुर, वैशाली ,बिहार

Saturday, April 13, 2024

सावित्री साहू

माँ
             --------=====

 नौ महीने तक अपने कोख मे रखती,
प्रसव की असहनीय दर्द सहती।
बच्चें के दुःख दर्द का ख्याल रखती
स्वयं सोती हैं गीले बिस्तर पर, बच्चों को सूखे मे सुलाती
वह होती हैं माँ 

बच्चों को तकलीफ होने पर उनका ह्रदय हैं रोती,
बच्चों की ख़ुशी मे सबसे ज्यादा वह खुश होती।
बच्चों को कष्ट मे देखकर अपने ममता के आंचल मे ढक लेती
वह होती हैं माँ

लल्ला मुन्ना राजा कहकर रूठने पर हैं मनाती
दुलार, पुचकार कर अपने हाथो से एक -एक निवाला खिलाती।
लेती हैं रोज बलैया, बुरी नजर से बचाने काजल टिका रोज लगाती
वह होती हैं माँ

घर आने पर सबसे पहले आँखे हैं जिसे ढूंढ़ती
हर सुख दुःख मे मन जिसे पहले याद करती।
जिसके बिना घर -आंगन सुना -सुना हैं लगती
अपनी दुःख, सुख जिसे पहले बताने को मन करती.
वह होती माँ हैं

रचनाकार 
श्रीमती सावित्री साहू 
          

अलका बालियान

माँ एक वरदान 
जीवन का वरदान लिए,
आशा की उड़ान लिए,  
करूणा का सागर लिए,  
समर्पण,स्नेह, त्याग की गागर लिए, 
चट्टान-सा धैर्य लिए,
शिखर-सा माधुर्य लिए,
धरती-सी प्रकृति लिए,
विश्वास की नीव लिए,
आँचल में सुख की छाँव लिए,
माता जीजा, गुजरी, पन्ना, अहिल्या बाई-सी
जीवन न्यौछावर करती है माँ | 
वर्तमान में असंख्य कौशल लिए,
घर और बाहर की जिम्मेदारी सँभालती है माँ ||
ईश्वर का अनुपम,अलौकिक आशीर्वाद लिए,
हर बालक के लिए अपरिहार्य है माँ ||
हर बालक के लिए अपरिहार्य है माँ ||

-अलका बालियान (आणंद) गुजरात 
-लेखिका (शिक्षिका)

अचला मिश्रा

माँ, मेरी प्यारी माँ , 
सरल ,सहज ,सुंदर थी , मेरी माँ , 
महीने के 30 दिन में 15 दिन तो वो,व्रत ही करती   ।            कभी पिता जी की लंबी उम्र के लिए तो                                कभी भाई के लम्बी उम्र के लिए
जन्म देने  वाली मेरी माँ  के लिए                                                                  
कभी किसी ने लम्बी उम्र का व्रत नहीं किया ।
शायद यही कारण की वे हमसे दूर चली गई ।    
भगवान तो थी ही इसलिए अपने धाम लौट गई।                    मेरी माँ ,बहुत भोली थी  ।
सब पर विश्वास जल्दी कर लेती थी पर .....

हमे कोई कुछ कह तो दे तो माँ जो है 
अम्बे गौरी  बन जाती थी   ।
जब भी मै देखती माँ बेटियों की जोड़ी,                                उनके मध्य होने वाली बातों की मैं कल्पना मात्र कर लेती ..      त्यौहार  में रौनक  माँ के  बनाये पकवान से होते है                               
जिनके पास माँ है  वो धनवान होते है। 
माँ दुआ करती है, आशीष  देती है।                                
माँ का आँचल, आसमान सा होता है ।
माँ  का होना,  इस धरा में भगवान का होना होता है ।।    

रचनाकार-                                                                    
© श्रीमती अचला मिश्रा ,
धरसींवा 36 गढ़

Friday, April 12, 2024

लूनेश कुमार वर्मा

आँचल ममता का
मोल नहीं कोई ममता का
हर रिश्ते-नाते से
ऊँचा है नाता ममता का
भय पीड़ा सब हर लेती है
आँचल ममता का
स्वर्ग सा सुकून मिलता है
माँ के आँचल में
आँच नहीं आती कभी हम पर
जब तक है हाथ ममता का
सारी दुनिया की
खुशियों से बढ़कर है
हाथ ममता का।
डॉ. लूनेश कुमार वर्मा
       डॉ. लूनेश कुमार वर्मा जन्म- 17-05-1977। जन्म स्थान- घोटिया, तह.पलारी, जिला- बलौदा बाजार (छत्तीसगढ़)। माँ श्रीमती रामप्यारी वर्मा, बाबूजी डॉ. टेकराम वर्मा। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं।
आपने एम.ए. संस्कृत, बी.एड., एम.ए. हिंदी, एम. ए. भाषा विज्ञान, केंद्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा, एम.ए. प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व, डिप्लोमा इन इंग्लिश, एम.फिल. हिंदी, पीएच.डी. हिंदी किया है। शिक्षा क्षेत्र में आपका 19 वर्षों का शिक्षण अनुभव है।
आपका शोध विषय "समकालीन कहानी लेखन के संदर्भ में उदय प्रकाश की कहानियों का साहित्यिक अनुशीलन" है। आपने उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी 'मोहनदास' का संस्कृत अनुवाद 'मोहनदास:' (2022) और 'तिरिछ' कहानी का संस्कृत अनुवाद 'तिरछ:' (2023) किया है। हिंदी कविता संग्रह ‘जीवन एक नदिया है’ (2023), हिंदी हाइकु संग्रह ‘खिलता पुष्प’(2023), गीना काव्य मंजूषा साझा संग्रह (2023), गीना लघुकथा साझा संग्रह (2023) आपकी कृतियाँ हैं।
आपने राष्ट्रीय और अंताराष्ट्रीय अनेक कार्यशालाओं, सेमिनार-वेबीनार में भाग लिया है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में संस्कृत-हिंदी-छत्तीसगढ़ी आधारित 55 से अधिक शोध परक लेख-आलेख प्रकाशित हुए हैं।
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल रायपुर, राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद छत्तीसगढ़ शंकर नगर रायपुर, शासकीय शिक्षा महाविद्यालय रायपुर, डाइट रायपुर, संस्कृत विद्यामंडलम् छत्तीसगढ़, संस्कृत भारती इत्यादि संस्थानों में विविध अकादमिक गतिविधियों में आपकी सक्रिय सहभागिता रहती है।
डॉ. लूनेश कुमार वर्मा (व्याख्याता)
मोबाइल नंबर- 8109249517
म.नं. 3349(रामालय) वार्ड- 61
काजल किराना के पास
शुक्ल वंशम के पीछे, 
रावतपुरा कालोनी फेस-01
मठपुरैना. पोस्ट- सुंदर नगर 
तह+जिला- रायपुर (छत्तीसगढ़)
पिन 492001 
ई मेल- luneshverma@gmail.com

नीना श्रीवास्तव

नए जमाने  के रंग में 
पुरानी सी लगती है जो
गिर जाने पर मेरे  
दर्द से सिहर  उठती जो 
  मेरी मां हां  मेरी मां ही तो है वो

सुई  में धागा डालने के लिए
हर बार मेरी मनुहार करती है जो
तवे से उतरे गर्म फुल्को में
जाने कितना स्वाद भर देती जो 
  मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो 

चश्मे के पीछे आंख गड़ाए 
हर चेहरे में मुझे निहारती जो
खिड़की के पीछे  टकटकी लगाए
मेरा इंतजार करती है जो
  मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो

मुझे सुलाती खुद रातों को जागती
चोट लगने पर सिहर उठती जो
अपने आचंल में छिपा कर 
हर  मुस्किल से बचाती जो 
 मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
   
मुझे परदेश भेजकर याद करके पलकें भिंगा लेती है जो 
मेरी खुशियों का जीवन का सार
मेरी मुस्कुराहटो की मिठास 
मेरी आशाओं का आधार 
  मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
     
  स्वरचित। कविता 
श्री मति नीना श्रीवास्तव 
जबलपुर मध्य प्रदेश 
 ११ / ४/ २०२४

Thursday, April 11, 2024

सूबेदार राम स्वरूप कुशवाह

विधा:- गीत 
                 ((ठिकाना))
मैं न जाऊं मथुरा काशी, गंगा नहीं नहाना है।।
मां के ही चरणों में यारों, मेरा ठोर ठिकाना है।।

चरणों में  चारों धाम,का है फल मिलता।
करके ए सेवा मां की, ह्रदय मेरा खिलता।।2
सेवा मिली चरणों की, और नहीं  चाहना ।
मां के ही चरणों में है,मेरा तो ठिकाना।।
मैं न जाऊं मथुरा काशी...................

करतीं हैं इच्छा पूरी, पूरी मनोकामना।।
चरणों से बढ़ कर मुझे और कोई धाम ना।।
मुझे मेरी मां है प्यारी, मां का मैं दिवाना।
मां के ही चरणों में है,मेरा तो ठिकाना।।
मैं न जाऊं मथुरा काशी...................

स्वरूप की तो केवल मां ही भगवान है।।
सारी दुनियां में न कोई  मां के समान है।।
समझे मुझे कोई पागल कहे कोई दिवाना।।
मां के ही चरणों में है,मेरा तो ठिकाना।।
मैं न जाऊं मथुरा काशी...................

रामचन्द्र कमल

माँ
माँ सबसे बड़ी है जग मे ममता के मोती लुटाये 
चाहे लाल को जग ठुकराये माँ गले लगाए

धर के अपने तन मे, नौ माह का भर उठाया है 
खून का दूध बनाकर, माँ ने हमको पिलाया
 बचपन मे ऊँगली पकड़ कर, हमको चलना सिखाया 
ज़ब भी दुख दर्द हुआ है, आंचल मे माँ ने छिपाया। 
क्या भला और क्या बुरा है, माँ ही हमको समझाये 
चाहे लाल को जग ठुकराये, माँ गले लगाए।

खुद भूखी भी रहकर, माँ प्यार से हमको खिलाती 
त्याग के अपनी निंद्रा, सुख चैन से हमको सुलाती 
ज़ब भी बेचैन हुए हम, माँ कि आँखे भर आती 
हर रिश्ते नाते जग मे, पहले माँ ही समझाती। 
यीशु और राम, मोहम्मद, गुरु गोविन्द माँ ने जनमाये 
चाहे लाल को जग ठुकराये, माँ गले लगाए।।

माँ कि सेवा का पल, पल भर भी तुम ना गवाना 
टुकराया जो तुमने माँ को, तुमको ठुकराये जमाना 
हर रिश्ते बन जायेंगे दोबारा, ये बात नहीं बिसराना 
माँ दुनिया छोड़ गई तो, मुश्किल है दोबारा पाना 
माँ कि ममता कि कीमत, ईश्वर भी 'कमल 'न दें पाए। 
चाहे लाल को जग ठुकराये, माँ गले लगाए ।।
© रामचन्द्र कमल 

Wednesday, April 10, 2024

कल्पना कमल

माँ और ममता
जमाने मे ममता कि क़ीमत ना होती, 
अगर माँ न होती, अगर माँ न होती। 

धर के उदर नौ माह संभाला,
जन्म से पहले माँ ने है पाला 
काया कि कोई वरियत न होती, 
अगर माँ न होती, अगर माँ न होती।

खून का अपने दूध बनाके 
हमको पिलाया हृदय से लगा के 
साँसो कि कोई हकीकत न होती 
अगर माँ न होती, अगर माँ न होती।

खुद भूखी रहकर, हमको खिलाया 
निंद्रा है त्यागी, हमको सुलाया 
कल्पना कमल कि शिनाखत ना होती 
अगर माँ न होती, अगर माँ ना होती।

© कल्पना कमल 

वर्षा शिवांशिका

शीर्षक:-  जन्मदात्री-माँ,
उठाकर गोद में सहलाया माँ, 
चूमकर गालों को लाड-लड़ाया माँ ।
लालन-पालन पोषण किया माँ।

बोली-वाणी में नाद भरी रूपहला माँ,
ह्रदय-से लोरी सुनाई,बहलाया माँ।
घुटनों से रेंगते, पैरों से चलना सिखलाया माँ।

बिगड़ी किस्मत को संवारा  माँ,
हँस कर , कष्ट सहती आपरा  माँ। 
बदले में कुछ नचाहे सहारा  माँ।

बड़ी न कोई रूपा निराला  माँ, 
मेरा मंदिर–मेरा शिवाला माँ।।
कोई न केवल तुम्हीं उजियाला माँ।

वात्सल्य,प्रेम की सागर तू माँ,
ममता की जीवित मूरत तू माँ।
करूणामयी ज्यों कुदरत  तू  माँ,।

ईश्वर का रूप, चारों धामों का फल है माँ,
बड़े भाग्यशली है वे,ज्यों आँचल है माँ।
सेवा-भक्ति करना उसकी, निर्मल है माँ।

वन्दनीय होती है माँ ,
पूज्यनीय होती है मॉ,
मॉ सचमुच होती है माँ।

वर्षा शिवांशिका 
कुवैत

रूपेश कुमार

माँ की दुनिया 
------------------

माँ विदा का रूप होती हैं ,
माँ जीवन की धूप होती हैं ,

माँ विदा का रूप होती हैं ,
माँ जीवन की धूप होती हैं ,

माँ दिन कि सूरज होती हैं ,
माँ रोशनी की मूरत होती हैं ,

माँ दुनिया की अनमोल रत्न हैं ,
माँ बिन जीवन है आधी अधूरा ,

माँ छाँव और आँचल होती हैं ,
माँ जीवन की सुख-दुःख होती हैं ,

माँ मेरी ममता की मूरत होती हैं ,
माँ में स्वर्ग और दुनिया दिखती हैं ,

माँ के चरणों में जन्नत मिलती हैं ,
माँ से हमें आशा, विश्वास मिलती हैं ,

माँ धरती और आकाश में दिखती हैं ,
माँ तारे और ग्रह, उपग्रह में दिखती हैं ,

माँ की दुआओं से ख़ुशियाँ भर जाती हैं ,
माँ की दुआओं से जन्नत अमरत्व मिलती हैं ,

रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार

Tuesday, April 9, 2024

संध्या गुप्ता

माँ

माँ ही तो है जननी जग में,
यहाँ माँ ही पालनहार है। 
माँ के दम से जीवन संभव, 
वरना सब कुछ बेकार है। 

इस आँचल की छाँव मिले जब,
जीवन उपवन बन जाता है। 
इक इसकी ही आहट से तो,
खंडहर भी घर कहलाता है। 

इतनी ताकत इसके श्रम में, 
सूरज भी  शीश नवाता है।
गोदी माँ की पाने हर युग 
ईश्वर धरती पर आता है।

माँ के पैरों की जन्नत में,
यूँ बसती दुनिया सारी है।
माँ शब्द तो छोटा है लेकिन,
पर इसकी महिमा न्यारी है।

माँ का अस्तित्व इस दुनिया में,
सच्चे जीवन का आधार है। 
उसके होने से ही जग में, 
बनता सुंदर परिवार है।

स्वरचित ✍️
संध्या गुप्ता
पटौदी, गुरूग्राम

Monday, April 8, 2024

नीना महाजन नीर

मेरी मां 


दीवार पर 
टंगी तस्वीर में तुम..
और 
इस जहां में मैं.. 
दोनों ही तन्हा हैं मां....

आंखें तलाशती 
तुम्हें हर कोने में.. 
यादें तेरी 
रुलाती हैं...
           
तेरे होने से 
ना था कोई ग़म 
पास थी जब तुम
खुशियों के आकाश
 पर थे हम.. 

किताबों की दुनिया में 
रहती थी गुम
घर के काम में 
ना लगता था मन 

 तब... 
 दूर भागती थी रसोई से मैं
 अब.. 
 दिन सारा वहीं बिताती हूं…. 

जलन हो मिर्ची की 
या कटे उंगली
मुस्कुराती हुई 
दर्द सभी पी जाती हूं... 

करती थी तुमसे 
दर्द के झूठे बहाने
अब
सच्ची तकलीफ़ भी
चुप रह सह जाती हूं..

मेरी आंखों में आंसू देख
तब रोती थी मां मेरे साथ 
अब हर परेशानी, तक़लीफ 
छिपा जाती हूं...

अब आ गई रिश्तों में बनावट 
कहां मेरा वो घर, मेरा आंगन
मां तेरे जाने के बाद 

ढूंढती हूं रिश्तों में अपनापन.. 
पर तुझसी ममता 
ना कहीं मिलती मां..

 ज़िदें फिर लबों पर न आईं 
 खुलकर कभी रो ना पाई
 मां तेरे जाने के बाद..  

सर्दी में ले लेती हूं 
अब गर्म रेशमी शाॅल
पर तेरी गोद सी..
वो गर्माहट ना पाती..

पूरी तो हो गई 
आज हर ख़्वाहिश 
पर तेरे बिना 
ज़िंदगी अधूरी ही पाती..

© नीना महाजन नीर 
गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश

डॉ माया एस एच

विषय: माँ का निस्वार्थ प्रेम 

माँ के चरणों में ही स्वर्ग का द्वार है, 
कोई व्यक्ति प्रचुर मात्रा में धन कमा सकता है, 
लेकिन माँ के निस्वार्थ प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है, क्योंकि वह स्वयं परमात्मा का आशीर्वाद है। 

कहते हैं वो लोग जिनसे माँ बहुत प्यार करती है, 
वे धन्य हैं क्योंकि दैनिक देवदूत उनका अत्यधिक मार्गदर्शन करते हैं, 
धरती पर मां जैसा सुंदर अक्स कहीं नहीं हैं, 
जैसे किसी की आत्मा में माँ का वास होता है। 


मंदिर के गर्भगृह में माता का स्थान होता है, 
दया और प्रेम की ऊर्जा का सबसे शुद्ध रूप  माँ है, 
किसी भी कलाकार द्वारा अब तक बनाई गई सबसे स्पष्ट पेंटिंग जो है , 
एक माँ की है जो अपने बच्चे का हाथ पकड़ती है।

कोई अपनी माँ के साथ हमेशा चल सकता है, 
बिल्कुल उस छाया की तरह जो हमें कभी अकेला नहीं छोड़ती हैं, 
माँ हमेशा अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छी ख़ुशी ढूंढ कर लाती है , 
बिल्कुल उन सितारों की तरह जो आकाश में जगमगाते हैं ।

स्वलिखित कॉपीराइट सुरक्षित

-डॉ माया एस एच
पुणे 
(महाराष्ट्र)

विजय डांगे

💐माँ 💐8,4,024
दुनिया में सच्चे प्यार की मूरत मां बिन कोई नहीं ।
मां का सीधा अर्थ ही ममता प्यार स्नेह का रूप वही ।। धृ।।
बचपन में बाल रूप मेरा ,माता संगोपन किया ।
नौ महीने निज शरीर संग, मां ने ही पालन खुद किया ।
जन्म दिया संस्कारों से, उपकार दूसरा कोई नहीं।।१।।
मां का********
 उम्र बढे गुरु बन माता ने, अच्छा बुरा भी सिखलाया ।
कुल और देश का नाम करो ,
रोशन ,भी उसने पढवाया।
 खानपान का ध्यान हमारा,मां
 बिन कौन करे कोई।।२।।
मां का******
 माता बिना जगदीश्वर भी,रह गया अधूरा ईश्वर लोक।
 अवतारण दुर्गा मां शक्ति ,करने सुरक्षा फिर सब लोक।
धरणि का दुख दूर किया, शक्ति अवतार विजय माई।।
मां का*********
☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️
रचनाकार_विजय डांगे,नागपुर

राहुल कंडारी

मां तुम कहां चली गई इस दुनियां को छोड़ कर 
मां तुम कहां चली गई मुझसे मुंह मोड़ कर 

मां तुम कहां चली गई सारे रिश्ते नाते तोड़ कर
मां अभी तो मैंने ये बचपन छोड़ा था
मां अभी तो मेने तेरे आंचल का साया छोड़ा न था 
मां अभी तो मेने किसी और से रिश्ता जोड़ा न था 

मां में हर बात से अनजान हूं तेरे बगैर 
मां मैं परेशान हूं तेरे बगैर 
मां तुम कहां चली गई इस दुनियां को छोड़ कर
मां तुम कहां चली गई हर रिश्ते नाते तोड़ कर

राहुल कंडारी 
ग्राम खलतरा 
चमोली

शालिनी श्रीवास्तव 'सनशाइन '

*मां*
एक अक्षर और दो मात्राएं
जिसमें सारी सृष्टि समाए।
             मां की महिमा हम क्या गाएं
             चरणों में बस शीश झुकाएं।
  मां की ममता,मां की गरिमा  
  स्नेह, त्याग की जो है प्रतिमा ,
              मां की सेवा ही मन्नत है,
              मां की गोदी में जन्नत  है।
   गुरू भी माता ,सखा भी माता,   
   मां का तो हर रूप है भाता।
             मां से ही यह जीवन सुंदर 
             मां की महिमा हर जन गाता।
  मां से ही सीखा है मैंने
  हर मुश्किल से लड़ना, 
             सुख- दुख जीवन की धूप-छांव  
             हर परिस्थित  में खुश रहना।
  जननी से पहचान हमारी,
  पालन करती धरती माता । 
             ज्ञान देती है गुरू माता 
             रक्षा करती देवी माता।
     मेरा गौरव मेरी माता 
     ईश्वर का हर रूप है माता।
              भारत माता के चरणों में ,
              शीश हमारा झुक-झुक जाता।
मां की बात जहां भी आए
स्वयं ईश भी शीश झुकाए,
              मां की ममता का सुख पाने
              राम- कृष्ण  धरती पर आए।
मां होने का अहसास, 
होता है बेहद खास।
        ईश्वर की अनुपम कृति हूँ 
        गर्व मुझे है मैं भी मां हूँ। 

स्वरचित  अप्रकाशित 
शालिनी श्रीवास्तव 'सनशाइन '
गोरखपुर  उत्तर प्रदेश।

Sunday, April 7, 2024

निकेता पाहुजा

*माँ मेरी अनमोल*

माँ तेरी ममता अनमोल,
माँ तेरी छाँव का सुःख अनमोल,
माँ मेरा वर्चस्व तू,
माँ मेरा सर्वस्व तू,तू ही जननी
तू ही शक्ति स्वरूप माँ,
रेगिस्तान की तिलमिलाती धूप में,
तू बारिश की ठंडी फुहार माँ,
नदी सी शीतलता भी तुझमें,
मंद मंद पवन की ठंडक भी तू,
हर स्वार्थ से विमुख,
तू जीवन का संचार माँ,
तेरी एक मुस्कुराहट में,
जीवन की हर मुश्किल का हल है माँ,
तेरी हर सीख जीवन के पायदान का साखी है
सुःख दुःख से परिचय करवाती,
ऐसी अद्भुत अनमोल शक्ति है माँ,
खुद गीले में सोकर
बच्चे को सूखे में सुलाती है माँ,
भूखी रह स्वयं, बच्चों के पालन पोषण में कसर ना छोड़े,
आँचल में जिसके स्वर्ग की अनुभूति,
माँ होती है सच्ची सहेली,
हर दर्द को सहकर जो माँ बनती है,
ऐसी जगत जननी स्वरुपा होती है माँ,
स्वंय में परिपूर्ण स्वरुप होती है माँ 
जिसके जैसा कोई और नहीं वो होती है माँ...
माँ एक तू ही रक्षक मेरी
बाकि तो सब भक्षक है।
तू रखे गर्भ में अपने
तन मन अपना वारकर
तू ही मेरी पोषक है।
तेरी छाया बचाये काली नजरो से,
गोद में तेरी निःस्वार्थ प्रेम
बाकि सब निरर्थक है।”


निकेता पाहुजा
रुद्रपुर उत्तराखंड

डॉ. स्वामीराम बंजारे 'सरल'

                          मां

'मां' ,मां होती है , ममता की खान होती है,

वह महान होती है ।

मां दुनियां जहान होती है,

कर्तव्य पर कुर्बान हाेती है,

मां भगवान होती है।

प्रकृति की अनुकृति और

सृष्टि की मूलाधार होती है मां ।

जहां शब्दों की सीमा समाप्त हो जाए

बस वहीं तो मां होती है।

नहीं है कोई त्यागी तपस्वी मां से बढ़कर

वह करुणा की प्रतिमूर्ति ,महान होती है।

जब गर्भ में पल रहा होता शिशु, तो

आत्म संयम का परिचय देती है,

खान पान पर नियंत्रण रखती है ,

 वह मां होती है ।

जब शिशु जन्म ले लेता है तो

दुग्धपान कराने तक भोजन पर

अंकुश  रखती , वह मां होती है।

निज इच्छाओं का परित्याग कर

बच्चे का हित अहित ध्यान में रख

जागती- सोती है, वह मां होती है ।

संतान की रूचि -अरूचि का ध्यान रख

पकाती रसोई , खिलाती अलोना -सलोना ,

 वह मां होती है ।

अपनी पसंद -नापसंद को ,दरकिनार कर

व्यक्तिगत इच्छाओं की तिलांजलि देकर

परिवार की बलि वेदी पर चढ़ जाती है,

वह मां होती है ।

बच्चों का हंसना -रोना

मां का हंसना रोना है ।

बच्चे को हल्की चोट लग जाने पर भी

जो बेचैन हो जाती है ,वह मां होती है ।

बच्चे की गलती पर डांटती है ,फिर

स्वयं आंसू बहाती है, वह मां होती है ।

परिवार समाज व देश के लिए

जो जीती मरती है ,वह मां होती है।

पहचान लेती है हर दर्द ,खामोशी में भी

वह सिर्फ मां होती है।

तू कण कण में है मां

मेरी नस नस में है मां

धरती भी एक मां है ,कवि भी एक मां है

जिसकी कोख से जन्म लेती है,

एक कविता, वह मां होती है,

जिसे पढ़ सुनकर जन्म लेती है

एक और कविता।

पुत्र पुत्री मां की संतान,

कवि धरती मां की संतान,

कविता कवि की संतान

'कविता' कविता की संतान,

बस मां ही मां है।

मां सचमुच महान होती है,

जहां शब्दों की सीमा समाप्त हो जाए

बस वही तो मां होती है।

 

डॉ.  स्वामीराम बंजारे 'सरल'

विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग

भा. प्र.दे.शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय

कांकेर छत्तीसगढ़

 

भावना मोहन विधानी

शीर्षक, सूनी दहलीज

जब तक मां थी घर में,
आंगन में रंगोली बनती थी।
सुबह शाम घर की दहलीज पर,
घी के दीपक में लौ जलती थी।
तुलसी भी सदैव प्रसन्न रहकर,
हरी-भरी सी खिलती थी।
सूर्य देव को जल चढ़ा कर,
मां को अपार खुशियां मिलती थी।
मंदिर में पूजा की घंटी बजा कर,
मां भजन और कीर्तन करती थी।
घर में छाई रहती थी खुशियां,
मुसीबतें कभी दहलीज पार नहीं करती थी।
मां की वजह से ही घर की,
दहलीज हमेशा सुरक्षित रहती थी।
घर की दहलीज कभी पार न करना,
मां बस हमेशा यही कहती थी।
मां के जाने के बाद अब घर की,
दहलीज सूनी सी लगती है।
सब कुछ पहले जैसा ही है घर में,
पर कुछ कमी सी लगती है।

सौ, भावना मोहन विधानी ✍🏻

रतन किर्तनिया

शीर्षक :-
           मेरी माँ
मेरी माँ है ममता की मूरत ,
देख के तुझे ;
सुकून मिलता है मुझे ,
जब देखता हूँ माँ की सूरत ,
मेरी माँ है वात्सल्य की मूरत ।

कितनी तकलीफ़ सह के -
हर दर्द को हँस के ,
गर्भ में पाला -
किया यमराज से लड़ाई ,
तब जाके मेरी माँ -
मुझे दुनिया दिखाई ।


आज भी है याद बचपन की -
हँसते - रोते माँ के इर्द - गिर्द घुमना ,
कभी माँ से लिपट जाना ,
एक मिठास बचपन की सुधा ,
माँ की आँचल में छुप जाना -
ममता की छाय में , धूप में ,
मुझे तो नज़र आती है ,
देवी , मेरी माँ की रुप में ,
मेरी माँ है ममता की मूरत ।

ममता की देवी है माँ हमारी -
हे माँ ! तेरी पद में तीर्थ - धाम हमारी ,
भक्ति पुष्पों से पूजू -
 हे माँ !  पद तुम्हारी ,
मैं प्रति दिन -
स्नेह की क्षुधा रहता हूँ प्रति दिन ,
प्रणय तुझे ना देखूँ -
तेरी दर्शनाभिलाषी हूँ हर दिन ,
तेरी दर्शन से सुकून मिलता है ,
उर में प्रेम पुष्प खिलता है ।


छोटी सी - प्यारी सी ;
एक शब्द है माँ ,
जननी से अनंत ब्रह्माण्ड ,
छोटी सी शब्द  -
पर है उत्कृष्ट ,
शब्द है छोटी सी -
छिपी है ममता की सागर  ,
माँ से दुनिया ए संसार ।


सुख - दुख की संसार में ,
काँटों से सजे जीवन में ,
माँ फूल बनके खिलती है ,
स्नेह की खुशबू फैलाती है ,
खुद सब कुछ सहके -
बच्चाें को लोरी सुनाती है ,
माँ ही तो है -
संतान की दर्द में आंसू बहाती है ,
माँ ही सर्वोच्च गुरु -
बच्चाें को नेक राह दिखाती है ,
माँ मेरी गुरु , माँ ही ज्ञान ,
माँ को मेरी कोटि - कोटि नमन ।


माँ के बिना संसार लगती है खाली -
माँ के बारे में लिखूँ तो -
कम पड़ जाऐंगे कागज ,
खत्म हो जाऐंगी कलम की काली ।

      रतन   किर्तनिया
पखांजूर पी व्ही 17 रविन्द्रनगर
    जिला :- कांकेर
      छत्तीसगढ़

मधुलिका मिश्रा

माँ को नमन।
 
माँ कभी है 
मातृभूमि,
तो कभी है 
वह जननी।
नैनों में बसे 
प्यार अपार, 
है जो कोमलता 
का संसार।
निर्मलता की 
है पर्यायवाची, 
जो कठिनाई को 
भी करे आसानी।
दुविधा जो आये 
तो विश्वास भी 
वही दिखाए कि 
तू अभी हारा नहीं।
है छाँव वो घनी सी 
जो धूप तेज़ हो जाए,
तो ममता की लहर सी
रूह को ठंडक पहुँचाए।
माँ है वो औषधि नर्म सी
जो हर ज़ख़्म भर जाए, 
फिर भी अपना दर्द 
किसी को ना बताए।
है अगर भगवान 
स्वर्ग  में, 
तो उसी के समान 
है माँ धरती पे।


मधुलिका मिश्रा
देहरादून, उत्तराखंड

डॉ तुलेश्वरी धुरंधर

कहाँ मै तुमको खोजूं माई
--------------------------------
कहाँ मैं खोजू तुमको माई कहाँ मैं तुमको खोजू ।

तेरे ममता के छाँव में माई बढ़ी पली और खेली हूँ।

कहाँ मैं ढूंढूं तुमको माई।2

1. मायके सुना हो गया, तेरे बिन मेरी माई।
इधर उधर से आके माई ,मुझको आवाज देगी। 
माई से मिल गले लगूंगी ,सोच के मैं रह जाती।
कहाँ मैं तुमको खोजू माई।
2, सभी अपने में भूले बैठे ,अब कौन  मझे है पूछे।
 छलनी हुवे जैसे मन लागे ,कौन पीड़ा मेरा  सुने।
 कहाँ मैं तुमको खोजें माई।2
3, जब जब बीमार पड़ी बचपन मे, रात रात भर जागी।
किस्सा कहानी, लोरी सुनाके प्यार से मुझे सुलाई।
कौन सुनाए लोरी अब कौन सुनाए कहानी।
कहाँ मैं तुमको
4 काकी बड़ी मामी मौसी में
झलक तुम्हारी खोजूं।
कौन मुझे ममता से सुलाये
और कौन मुझे दे आशीष ।
कहाँ मैं तुमको खोजूं माई
कहाँ मैं तुमको ढूंढूं माई, 
कहाँ खो गई मेरी माई।
कहाँ मैं तुमको खोजूं।
रचनाकार-डॉ तुलेश्वरी धुरंधर, अर्जुनी,बालौदाबाजार,(छत्तीसगढ़)

परनीत थानेवाल

माँ की ममता 
जब मैं हस्ती , माँ भी हस्ती
जब मैं रोती माँ भी रोती 
मुझे मिली माँ की गोद निराली 
माँ की ममता होती निराली 
सुबह – सुबह वो मुझे जगाती 
बड़े प्यार से गले लगाती 
जब ठोकर खाकर मैं गिरती 
माँ दोनों हाथ आगे बढ़ाती 
माँ की ममता होती निराली
माँ ने मुझे हाथ पकडकर चलाना सिखाया 
गलती करने पर बड़े प्यार से गले लगाया 

परनीत थानेवाल 
विकास पुरी , नई दिल्ली

कमल पटेल

*(वो तो मेरी मां है)*
___________________________
चंद दिनों पहले,
मुझसे पूछा गया सवाल।
जब जवाब ढूंढा मैंने तो,
मैं तो हो गया निहाल।।
जीवन में कोई हुआ सहाई,
जो तुम्हारी यादों में 'जमा' है?
बहुत गहराई से सोचा मैंने,
उत्तर मिला, वो तो मेरी मां है।(१)

इस धरा पर लाया मुझको,
अपनी गोदी में खिलाया मुझको।
गीले बिस्तर में खुद सो कर,
सूखे में सुलाया मुझको।।
जिसका हर पल मेरी चिंता में ,
आज तक गुज़रा है, वो तो मेरी मां है।(२)

समाज में रहना है कैसे,
मां ने है सिखलाया।
सदाचार मानवता क्या है,
मां ने है बतलाया।।
पिता के सामने बन अधिवक्ता,
मुझको अपना अधिकार दिलाया‌‌।
जिसकी ममता की पूंजी, 
मेरी खुशियों के लिए जमा है।।
मैं गर्व से कहता हूं, हां वो तो मेरी मां है।(३)

चाहे जननी मां हो, या धरती मां,
दोनों ने खूब दुलार किया।
कर सकूं जीव मात्र की सेवा,
इस हेतु तैयार किया।।
स्वयं कष्ट उठाकर मुझको,
दिया उन्मुक्त आसमां है।
बड़े गर्व के साथ कहता हूं ,
वो तो मेरी मां है।।(४)

स्वरचित-
कमल पटेल चकरावदा
उज्जैन (मध्य प्रदेश)

Saturday, April 6, 2024

कुमार सुनील नारायण

माँ

आँख खुली माँ तुझको पाया,
तू  पीड़ा  से   तड़प  रही  थी,
मुझे  अपने सीने  से  लगायी,
अपनी  पीड़ा  भूल  गयी  थी।

शीतल शांत आंचल  की छाँव में,
मैं   पलता   रहा   हुआ   सयाना,
पापा  कहते - खुद   कष्ट  सहती,
मुझपर तनिक न कष्ट आने देती।

धरा  पर सबसे उपर माँ का दर्जा,
युगों  से  पूजे  सब  देव-मुनी-नर,
निस्वार्थ  भाव  से  पालन  करती,
हर-क्षण चाहती संतान-खुशी वो।

जितने  भी  जीव  इस  धरा  पर,
सबके   माँ    होती   है   निराली,
कोई  माता  कुमाता  नहीं  होती,
कुछ पुत्र-कुपुत्र होते बहकावे में।

अन्य  रिश्ता   पुनः   मिल  जाए, 
माँ  का  रिश्ता  न  मिले  दुबारा,
उनको  कभी   रुसवा  न करना,
अनन्य पीड़ा  सह पाली तुमको।

सृष्टि  निर्मात्री   शक्ति   तेरी  अदम्य  अपार,
विपत्ति आए संतान भिड़ जाए देव व काल,
तेरी अभिनंदन करू नित्य वंदन,
हे माँ ! आपको  शत-शत नमन।

कुमार सुनील नारायण 
मधुबनी,बिहार

राजन कार्तिकाय

सॉनेट(छन्द)--

              !!माँ!!

माँ!भोरकी प्रथम किरण है,
रोज  हृदय-प्राची पर आती,
नहीं प्रतीची-ओर  बढ़ती है,
रहती   प्रेम - धूप  बरसाती,
आत्मिकताका गीत सुनाती,
माँ  का अंत कभी ना  होता,
माँ  होती  संतति-उर-थाती।

संतति-हित-पथ-जीती रहती,
दाम्पत्य - विष - पीती   रहती,
स्वजन हेतु  दरिया-सम बहती,
कुहरकुहर कर हर दुख सहती,
माँ जल्दी ना निज दुख कहती।

सिद्ध  ना  ऐसी-वैसी  माता,
होती   धरती   जैसी   माता।

--स्वरचित एवं मौलिक--
राजन कार्तिकाय 
हिन्दी शोधप्रज्ञ
पाटलिपुत्र विश्व विद्यालय पटना,बिहार 
Rajankan220387@gmail.com

प्रणीता प्रभात

" मेरा अभिमान मेरी मां "                           
मां ........
एक शब्द में समाहित मेरा सारा संसार,                  
 स्नेहिल, गरिमामयी, उत्कृष्ट ,                     
 ममता की मूरत .........                       
क्या कहूं , हर शब्द छोटा है ,                  
मेरी मां के आगे..........                          
प्यारी सी भोली मुस्कान ,                        
सबके लिए दिल में सम्मान ,                       
ममता से भरी हुई ,                               
अपने बच्चों की है शान ,                        
यही तो है मेरी मां की पहचान .........             
तन्हाई में उसकी याद ,                         
आज भी रुला देती है ,                         
जब नींद ना आए ,                                
उसकी थपकी झट सुला देती है ,           
जाने कैसे पहचान लेती है ,                     
हमारी परेशानी ............                      
परियों की तरह झट,सुलझा भी देती है                        
सबके लिए इतना प्यार ,                       
जाने कहां से लाती है ,                         
अपने लिए उसकी झोली ,                     
हमेशा छोटी पड़ जाती है ,                    
हमारी जन्नत, हमारी मन्नत ,
हमारी पूरी दुनिया है वो ,                       
चारों धाम हमारी , सारे तीरथ है वो ,                         
भगवान से पहले , मेरी मां है मेरे लिए ,                      
जान है हमारी  ,                                  
पूरा जहान है वो मेरे लिए ,                   
यही दुआ है हर जन्म ,                          
मेरी मां की ही गोद मिले,                     
बन पाऊँ मैं उनके जैसी ,                       
शायद ऐसा मौका मिले...........!!!   
       
स्वरचित 
प्रणीता प्रभात
फरीदाबाद , हरियाणा

सुमा मण्डल

कर ले मां की बंदगी

कर ले इस कदर तू मां की बंदगी।
कि संवर जाए तेरी यह जिन्दगी।

राम जी ने सिर्फ जननी को ही नहीं,
सौतेली माताओं को भी दिया मान।
दिया हृदय में अपनी मां का ही स्थान।

नौ मास नौ दिन गर्भ में तुझे पाला।
मृत्यु से लड़कर फिर बाहर निकाला।

खिलाया अपने हिस्से का एक- एक निवाला।
महसूस नहीं होने दिया तुझे अपना दिवाला।

तू न सुन सके कराह, दे रखा जुंबा पे ताला।
तेरी विपदा को नित रौद्र रुप पकड़ टाला।

तेरे सुख के लिए स्वयं को चट्टान बना डाला।
सीने से चिपका कहती मेरे नयनतारा, मेरे लाला।

जप तू सदा उस मां के नाम की माला।
छंट जाएगा विपत्ति का बादल काला।

टूट जाएगा संकट रूपी मकड़ी का जाला।
कर जाएगा पार सारे दुःख रूपी नदी - नाला।

जीवन का स्वर्ग है चरणों में मां के।
बस जा तू उन्हीं चरणों में  ही जा के।
हो जाएगा धन्य मां का आशीष पा के।


     रचयिता -श्रीमती सुमा मण्डल
     वार्ड क्रमांक 14 पी व्ही 116
     नगर पंचायत पखांजूर
     जिला कांकेर छत्तीसगढ़

Thursday, April 4, 2024

विभूति सिंह

( मां )
मां ,मैं तुम पर क्या लिखूं ?
शब्दों में कैसे तुमको बयां करूं,
तुम रूप हो जगतजननी का ,
कैसे तुमको रचना में  रचूं ?
मां मैं तुम पर क्या लिखूं ?

तुम लाई इस दुनिया में,
क्या मैं तुमको अपनी दुनिया लिखूं?
अपने लहू से सींचा तुमने ,
सीने से लगाकर पाला तुमने ,
क्या मैं तुमको पालन हार लिखूं ?
चलना सिखलाया तुमने ,
बोलना सिखलाया तुमने,
दी सही गलत की समझ तुमने ,
क्या मैं तुमको शिक्षक लिखूं ?
मां मैं तुम पर क्या लिखूं?

दूर रखा परेशानियों को हमसे ,
तुमने दुख - दर्द से बचाया ,
लग ना जाए बुरी नजर,
तो काला टीका भी लगाया,
क्या मैं तुमको रक्षक लिखूं ?
मां मैं तुम पर क्या लिखूं ?
तुम सारी दुनिया हमारी ,
तुम पालनहार ,तुम शिक्षक, तुम रक्षक ,
क्या मैं तुमको अपना सब कुछ लिखूं ?
मां ,मैं तुम पर क्या लिखूं ?
                          ( विभूति सिंह )              
  Address - house number -42 ,Royal Enclave, Kashipur, Uttarakhand

मोनिका डागा "आनंद" , चेन्नई, तमिलनाडु 🙏❤️🙏

शीर्षक - मेरी प्यारी मां -

भोर होती जिसकी मीठी आवाज से,

रात होती शुरू सर को सिरहाते हाथ से,

मेरे जीवन के हर पल को "आनंद" से भरती,

मेरी प्यारी मां ।



मेरे दुखों का हो जाता उसको गहरा एहसास,

लगती भूख मुझको उससे पहले तैयार पकवान थाल में,

खिलाती अपना प्यार भरकर बड़े चाव से हरबार,

मेरी प्यारी मां ।



चाहती बदले में कुछ कभी भी ना मुझसे,

मेरे लिए प्रार्थना करती प्रभु से बार-बार वो,

बन जाती मेरी ढाल, मुसीबत कोई भी आए रहती मेरे साथ साथ,

 मेरी प्यारी मां ।



सफल हो जाऊं मैं अपना जग में नाम बनाऊं,

पीछे सारी मेहनत दिन - रात करती बिना रुके,

जीवन में आने वाली चुनौतियों के लिए मुझको तैयार करती,

मेरी प्यारी मां ।



चोट लगती कभी मुझको अपना दर्द दिल में छुपाती,

ले मुस्कुराहट जीवन की हार को अपनाना सिखाती,

यकीन रखो अपनी मेहनत पर, वक्त पर करो ऐतबार कहती, 

मेरी प्यारी मां ।



भेद ना करती कोई भी छोटा हो या बड़ा,

सब बच्चों को एक जैसा प्यार देती,

मिलजुल कर जीवन में एक डोर में रहना तुम सब कहती,

मेरी प्यारी मां ।



कर्म जीवन का पहला है परोपकार,

महत्वाकांक्षा को कभी न देना तुम अपने जीवन में कोई अधिकार,

अच्छा नागरिक बन देश की समय-समय पर करना सेवा सिखाती,

मेरी प्यारी मां।

ममतामयी रूप हैं ईश्वर का साक्षात धरती पर,

कोई लिख ना सकेगा पूरी अपनी कविता उस पर,

शब्द भी कम पड़ जाएंगे उसकी महिमा को गाकर,

मेरी प्यारी मां ।

  -  मोनिका डागा  "आनंद" , चेन्नई, तमिलनाडु 🙏❤️🙏  

आपके स्नेह और प्यार का धन्यवाद !💕

रचना ( स्वरचित व सर्वाधिकार सुरक्षित) ✍️

Wednesday, April 3, 2024

भगत सिंह

 मन की मन में माँ रखती है 

बाहर-भीतर है 
अलग-अलग से रूप समेटे 
तन पर ज़िम्मेदारी के आँचल को लपेटे
माँ मंद-मंद सा मधुर-मधुर सा एक गीत 
बिखरे जाती है गोदी से कोमल सी प्रीत 
माँ ही तो पोतती
कच्चे मन की तख्ती है 
मन की मन में माँ रखती है॥ 

उड़ती रहती है दिनभर 
ममता फुदक-फुदक 
जगती है, जब सब सो जाते दुबक-दुबक
गिरती चद्दर को वही लपेटे 
बिखरे कमरे को वही समेटे 
सोती सबके बाद मे माँ ही 
सबसे  पहले जगती है 
मन की मन में माँ रखती है॥

खुद के सपनों को आधा जीती
आधे सपनों के घूंट को पीती
उधड़े घर के धागों को सीती
खातिर घर के ही है बस जीती
जब हो द्वंद्व दो जानो का पहचानो का 
आपस की कच्ची कड़वी बातें 
उम्मीद लगाकर चखती है 
मन की मन में माँ रखती है

सुनती है सब सुनती है 
सुनकर मन ही मन गुनती है 
बिना बताए समझे सब
बस उसकी दुआ को जाने रब
माँ  डोर है जो बांधे घर को
मन भीतर रखे हर डर को 
माँ का दुलार भी तो एक भगवद भक्ति है
मन की मन में माँ रखती है

माँ नींव है जिस पर घर है टिके
माँ लौ वो जिसमें घर है दिखे 
भिड़ जाती है व्यंग्य बाण के तीरों से 
जकड़ी है ज़िम्मेदारी की जंजीरों से 
जज़्बातों का उसके भान किसे 
माँ के मन की पहचान किसे
माँ कुन्दन सी घर की भट्ठी में पकती है 
मन की मन में माँ रखती है
भगत सिंह 
हरियाणा

Tuesday, April 2, 2024

अन्जू परिहार

माँ जैसा न है कोई दूजा
माँ एक आंचल है,
जिसमें छुप जाने को जी करता है।
माँ एक कविता है,
जिसे बार बार पढ़ने का मन करता है।

माँ एक खजाना है,
जिसे संजोकर रखने का मन करता है।
माँ एक दर्पण है,
जिसमें ईश्वर को देखने का मन करता है।

माँ की गोद एक झूला है,
जिसमें झूलने का मन करता है।
माँ की लोरी एक संगीत है,
जिसे बार बार सुनने का मन करता है।

माँ जिसने बारंबार मन्नतें,
कर मांगा है मुझे।
माँ जिसने दर्द सहकर भी,
पाला है मुझे।

माँ जिसने हर समस्या का हल,
बताया है मुझे।
माँ जिसने दुनिया मे खडे़ रहना,
सिखाया है मुझे।

माँ जो किसी की बेटी है,
एक पत्नी भी है।
माँ जो किसी की बहन है,
एक बहू भी है।

माँ की बातों मे डांट है फटकार,
माँ के दिल मे है ढेर सारा प्यार।
माँ जैसा जग मे न है कोई दूजा,
जो भी करे इसकी बारंबार पूजा...।

- अन्जू परिहार
शाहजहांनाबाद, भोपाल, मध्यप्रदेश

Monday, April 1, 2024

भूपेन्द्र कण्डारी

मां
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 मां जननी है हम सब की 
 इस भू धरा पर और इस संसार में।

मां दयानिधान है दुःख हर्ता है
अपने लाल और पालनहार के 

मां समस्त दुःखों की निवारणीय है
मां ममत्व का अपार भण्डार है

घर आंगन में खुशहाली है 
जब घर मां का मान समान है

उन घरों में हमेशा खुशहाली रहती है
जिन घरों में प्यार बांटती है।

मां के लिए न कोई छोटा न कोई बड़ा
मां तो सिर्फ और सिर्फ मां होती है 
 
                भूपेन्द्र कण्डारी
                 (चमोली उत्तराखंड)

श्रवण सिंह राव

विषय= मां   

संपूर्ण संसार का मान है मां
 हमारे घर -आंगन का सम्मान है मां 
सुख दुःख का सार है मां 
सेवा, क्षमा, ममता की मूरत है मां

हमारी तरक्की का आधार है मां
जीवन का आधार  है मां 
लक्ष्मी का स्वरूप है मां 
हमारे रसोईघर की अन्नपूर्णा है मां
धैर्य ,सरलता, त्याग ,समर्पण ,दया ,का नाम ही है मां 

आशा अभिलाषा का नाम है मां ईश्वर के समान ही है मां 
स्वर्ग का भंडार है मां 
सादगी शर्म और जरूरत पड़ने पर वीरांगना का नाम ही है मां 

भक्ति-शक्ति का प्रमाण है मां 
आत्मनिर्भर का नाम है मां 
सहयोग एवं उत्तरदायित्व का सार है मां
आदर्श- संस्कार का नाम है मां 
मातृ शिक्षा का भंडार है मां!!

श्रवण सिंह राव आहोर, ज़िला जालोर राजस्थान 🙏

श्रीमती अरुणा अग्रवाल

शीर्षक "मां"
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01,03,2024,

मां है ईश्वर का अनुपम उपहार,
सृष्टि का प्रावधान,प्रथम,मुरार,
माता एकाधार में प्रथम,गुरू,
घर-परिवार करे स्वर्णिम-संसार। ।

मां होती अन्नपूर्णा,सरस्वती का
भी रूप,भार्या,सुता,बहन एक,
सही दिनचर्या से करे श्रीगणेश
पूजा,अर्चना,खान-पान, आवेश।।

मां बाल का सर्वांगीण विकास,
हेतु तिलाजंलि कर देती,सुख,
पति,सास,ससुर का देखभाल,
महारत सर्व विधि,विधान,मृणाल।।

जब शेष रह जाता समय कुछ,
सदुपयोग करती स्व देखभाल,
फिर भी बचे तो करे समाजिक-
कार्य का भी विधिवत,ध्यान,एकैक।।

मां है निःस्वार्थ सेवा का नाम,
इसका ॠण चुकाना,कठीन-
कार्य,एक जनम तो क्या लेना-
होगा सात जन्म कि हो रिॠण।।

प्रेषिका 
श्रीमती अरुणा अग्रवाल
लोरमी, जिला मुंगेली, छ, ग,
संपर्क: 9981830087

अनिल पांचाल सेवक

*प्रेषित है......*              👇 *मां*👇 *••••गिरावट ना मिलावट....* _____________________________ *दुनिया में कच्चे रंगों वाली सजावट देखी,...