Wednesday, April 3, 2024

भगत सिंह

 मन की मन में माँ रखती है 

बाहर-भीतर है 
अलग-अलग से रूप समेटे 
तन पर ज़िम्मेदारी के आँचल को लपेटे
माँ मंद-मंद सा मधुर-मधुर सा एक गीत 
बिखरे जाती है गोदी से कोमल सी प्रीत 
माँ ही तो पोतती
कच्चे मन की तख्ती है 
मन की मन में माँ रखती है॥ 

उड़ती रहती है दिनभर 
ममता फुदक-फुदक 
जगती है, जब सब सो जाते दुबक-दुबक
गिरती चद्दर को वही लपेटे 
बिखरे कमरे को वही समेटे 
सोती सबके बाद मे माँ ही 
सबसे  पहले जगती है 
मन की मन में माँ रखती है॥

खुद के सपनों को आधा जीती
आधे सपनों के घूंट को पीती
उधड़े घर के धागों को सीती
खातिर घर के ही है बस जीती
जब हो द्वंद्व दो जानो का पहचानो का 
आपस की कच्ची कड़वी बातें 
उम्मीद लगाकर चखती है 
मन की मन में माँ रखती है

सुनती है सब सुनती है 
सुनकर मन ही मन गुनती है 
बिना बताए समझे सब
बस उसकी दुआ को जाने रब
माँ  डोर है जो बांधे घर को
मन भीतर रखे हर डर को 
माँ का दुलार भी तो एक भगवद भक्ति है
मन की मन में माँ रखती है

माँ नींव है जिस पर घर है टिके
माँ लौ वो जिसमें घर है दिखे 
भिड़ जाती है व्यंग्य बाण के तीरों से 
जकड़ी है ज़िम्मेदारी की जंजीरों से 
जज़्बातों का उसके भान किसे 
माँ के मन की पहचान किसे
माँ कुन्दन सी घर की भट्ठी में पकती है 
मन की मन में माँ रखती है
भगत सिंह 
हरियाणा

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