Tuesday, April 2, 2024

अन्जू परिहार

माँ जैसा न है कोई दूजा
माँ एक आंचल है,
जिसमें छुप जाने को जी करता है।
माँ एक कविता है,
जिसे बार बार पढ़ने का मन करता है।

माँ एक खजाना है,
जिसे संजोकर रखने का मन करता है।
माँ एक दर्पण है,
जिसमें ईश्वर को देखने का मन करता है।

माँ की गोद एक झूला है,
जिसमें झूलने का मन करता है।
माँ की लोरी एक संगीत है,
जिसे बार बार सुनने का मन करता है।

माँ जिसने बारंबार मन्नतें,
कर मांगा है मुझे।
माँ जिसने दर्द सहकर भी,
पाला है मुझे।

माँ जिसने हर समस्या का हल,
बताया है मुझे।
माँ जिसने दुनिया मे खडे़ रहना,
सिखाया है मुझे।

माँ जो किसी की बेटी है,
एक पत्नी भी है।
माँ जो किसी की बहन है,
एक बहू भी है।

माँ की बातों मे डांट है फटकार,
माँ के दिल मे है ढेर सारा प्यार।
माँ जैसा जग मे न है कोई दूजा,
जो भी करे इसकी बारंबार पूजा...।

- अन्जू परिहार
शाहजहांनाबाद, भोपाल, मध्यप्रदेश

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