Monday, April 15, 2024

अनिल पांचाल सेवक

*प्रेषित है......*
             👇 *मां*👇

*••••गिरावट ना मिलावट....*
_____________________________

*दुनिया में कच्चे रंगों वाली सजावट देखी,*
*रिश्तों के बीच मखमली बनावट भी देखी।*
*बच्चों की आंखों में आंसू ओर मां मुस्कुराएं,*
*दुलार में उसके न कभी कोई गिरावट देखी।।*
_____________________________
*पिता के डांटने पर तेरी वो बगावत देखी,*
*मेरी मुसीबतों में तेरी अकुलाहट भी देखी।*
*वर्षों से महसूस किया है मैंने मां के प्यार को,*
*उसकी स्नेह में कभी न कोई मिलावट देखी।।*
_____________________________
*अनिल पांचाल सेवक* ✍️
......9993152064.... 
*विचार क्रांति मंच उज्जैन*
-----++++++++-----------

सुशील चन्द्र बाजपेयी

*मां*

*अंतस्तल की आकुलता को*
*देख रहे हैं नभ के तारे।*
*निविड़ निशा की  नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*सब कुछ सूना सा लगता है।*
*प्रतिपल व्यथा भाव जगता है।*
*कोई दस्यु सदृश ठगता है।*

*रोम रोम कंपित हो जाता,*
*किसी अनागत भय के मारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*मेरे इस एकाकीपन में।*
*उद्वेलन हो रहा है मन में।*
*कंटक से चुभते हैं तन में।*

*बांध नहीं पाते हैं क्षण भर,*
*जगती के संबंध यह सारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*जो तुम हो पाये नहिं अपने।*
*क्या होगा बुनकर के सपने।*
*छोड़ न देना मुझे तड़पने।*

*मेरे नष्ट प्राय जीवन को,*
*बिना तुम्हारे कौन संवारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*अनाद्यंत इस जग माया में।*
*त्राण तुम्हारी कर छाया में।*
*मोह नहीं नश्वर काया में।*

*मुझमें आत्म ज्योति बन चमको,*
*अंधकार में हों उजियारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*श्वांस श्वांस है ऋणी तुम्हारी।*
*भ्रमित हुआ मैं मति थी मारी।*
*दिन क्या? एक एक पल भारी।*

*कर अविलम्ब कृपा मेरी मां,*
*नष्ट करो त्रय ताप हमारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*

*सुशील चन्द्र बाजपेयी*
*लखनऊ (उ.प्र.)*

अमिता अनुत्तरा

मुझे अच्छा नहीं लगता
मेरी मां की उमर का बढ़ना 
अब मैं बूढ़ी हो रही हूं न 
उसका ये कहना 
मुझे अच्छा नहीं लगता ।
सूरज से पहले 
अम्मा को उठते देखा है 
पूजा की थाली , कंकू रोरी
रामायण की चौपाई
मैंने तो अम्मा में ही देखा है ,
लेकिन झटके से मेरी अम्मा 
अब उठ भी ना पाती है 
जब सहलाती है अम्मा 
अपना दर्द भरा घुटना 
मुझे अच्छा नहीं लगता ।
मेरी मां की उमर का बढ़ना 
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
चंदा की शीतलता को मैने तो 
अपनी अम्मा के हाथों में पाया है 
दुनिया की चालाकी में 
कैसे अपनी जगह बनाऊं 
अम्मा ने बातों ही बातों में 
समझाया है ,
सुख में ,दुख में रहने की 
अब तो आदत सी हो गई है 
लेकिन अम्मा बिन तेरे रहना 
मुझे अच्छा नहीं लगता ,
मेरी मां की उमर का बढ़ना 
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
                    अमिता अनुत्तरा

Sunday, April 14, 2024

शिल्पी मजूमदार

याद आती है मां
तुम कहा चली गई हो माँ 
तुम्हारी बहोत याद आती है माँ ।
पता नही ये एक एक पल
कैसे बीते तुम्हारे बाद
तुम्हारे साथ हंसना, रोना
तुम्हारा डांटना, तुम्हारा समझाना
बहुत याद आता है माँ ।।
कितना वक्त हो गया तुम्हे देखा नही,
तुमसे मिली नही, हाथो से खिलाया नहीं
सबकुछ बहुत याद आता है माँ ।
मुझे याद है तुम्हारा संघर्ष
कैसे तुमने काटा एक एक वर्ष
पापा के जाने के बाद
तुमने हमे कैसे बड़ा किया
सबकुछ बहुत याद आता है माँ ।
रिश्तों का पाठ तुमने पढ़ाया,
दुनियादारी तुमने समझाया
उठना ,बैठना ,कहना, सुनना,
सब तुम्हिने तो सिखाया ।
अब दो पल बांटने को तुम हो नही
तुम कहा चली गई हो माँ
तुम्हारी बहुत याद आती है माँ । 

✍️
शिल्पी मजूमदार

श्री मती ज्योति किरण चंद्राकर

माँ
कितनी ममतामयी होती है मां ।
अपनी हर गम छिपा लेती है मा।
धरती सी सहनशील।
अंबर सी विशाल होती है मां।
 त्याग ,बलिदान ,समर्पण की मूर्ति है मां। 

अपनी संतानों के लिए हर कुछ अर्पण करती है मां ।
सबसे बड़ी पथप्रदर्शक है मां ।
जीवन के सारे दुख हारती है मां ।
कितनी ममतामयी होती है मां ।
अपनी हर गम छिपा लेती है मां ।

© श्री मती ज्योति किरण चंद्राकर 

श्रीमती हासीरानी बैनर्जी

" माँ "                   

जननी जन्म भूमिश्च, 
                  स्वगधपि गरियसी, 

माँ है तो हम है, 
             माँ नहीं तो हम नहीं। 

भूमि है तो अन्न है, 
              भूमि नहीं तो अन्न नहीं। 

माँ गया, काशी, वृन्दावन है, 
      माँ ही शिक्षा, धर्म, कर्म, मर्म है। 

माँ प्यारी माँ न्यारी, 
                  माँ ही पवित्रता है। 

माँ ही शीतल,सरल, स्वच्छन्द है, 
      माँ ही सुबह, शाम, आनंद है। 

माँ ने हमें धर्म का पाठ पढ़ाया, 
 
माँ ही तो जीने का रास्ता दिखाया। 

मातृ दर्शन से दुख दुर हो जाता है, 

 मातृ दर्शन से सभी तीर्थ हो जाता है। 

माँ शक्ति साधन हमारी, 
     माँ ही तो है संसार सारी।

      रचयिता -श्रीमती हासीरानी बैनर्जी 
      सहायक शिक्षिका 
      आश्रम शाला परसदा खुर्द 
      विकास खंड छुरा 
     जिला गरियाबंद छत्तीसगढ़

भगवान दास शर्मा "प्रशांत"

*शीर्षक :मां*

मां तुम ही हो शक्ति स्वरूपा,
सम्पूर्ण सृजन आधार हो।
तुमसे ही है घर की शोभा,
करुणा वात्सल्य अवतार हो।।

बच्चों की तुम प्रथम शिक्षिका,
बच्चों के हित अड़ जाती हो।
तभी तुम कहलाती जगत में,
बच्चों की पालक औ रक्षिका।।

प्रतिमूर्ति हो सहनशील की,
सब तकलीफे सह लेती हो।
लोगों की खुशियों की खातिर,
चुपके से तुम सह लेती हो।।

प्रेम समर्पण भाव में डूबी, करुणामयी बन जाती हो। जब भी आता कठिन समय तो,
धैर्यवान धरा बन जाती हो।।

अपने बच्चों की खातिर तुम,
मौत से भी लड़ जाती  हो।
सदाचार मूल्यों की पोषक,
बच्चों को सदमार्ग दिखाती हो।।

मां धरणी जैसा है रूप तेरा,
बन क्षमाशील सह जाती हो,
 मन मे नहि रखती बैर द्वेष,
सदा सबकी प्रिय बन जाती हो।।

मां तुम जैसा दूजा नहि कोई,
नश्वर इस सकल संसार में।
ईश्वर की अद्भुत रचना मां,
सकल सृष्टि सृजन के सार में।।

भगवान दास शर्मा "प्रशांत"
इटावा उत्तर प्रदेश दूरभाष: 9457097 599 
ईमेल: bhagwandas.das@rediffmail.com

अनिल पांचाल सेवक

*प्रेषित है......*              👇 *मां*👇 *••••गिरावट ना मिलावट....* _____________________________ *दुनिया में कच्चे रंगों वाली सजावट देखी,...