*मां*
*अंतस्तल की आकुलता को*
*देख रहे हैं नभ के तारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*
*सब कुछ सूना सा लगता है।*
*प्रतिपल व्यथा भाव जगता है।*
*कोई दस्यु सदृश ठगता है।*
*रोम रोम कंपित हो जाता,*
*किसी अनागत भय के मारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*
*मेरे इस एकाकीपन में।*
*उद्वेलन हो रहा है मन में।*
*कंटक से चुभते हैं तन में।*
*बांध नहीं पाते हैं क्षण भर,*
*जगती के संबंध यह सारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*
*जो तुम हो पाये नहिं अपने।*
*क्या होगा बुनकर के सपने।*
*छोड़ न देना मुझे तड़पने।*
*मेरे नष्ट प्राय जीवन को,*
*बिना तुम्हारे कौन संवारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*
*अनाद्यंत इस जग माया में।*
*त्राण तुम्हारी कर छाया में।*
*मोह नहीं नश्वर काया में।*
*मुझमें आत्म ज्योति बन चमको,*
*अंधकार में हों उजियारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*
*श्वांस श्वांस है ऋणी तुम्हारी।*
*भ्रमित हुआ मैं मति थी मारी।*
*दिन क्या? एक एक पल भारी।*
*कर अविलम्ब कृपा मेरी मां,*
*नष्ट करो त्रय ताप हमारे।*
*निविड़ निशा की नीरवता में,*
*हे मां! तुमको प्राण पुकारें।*
*सुशील चन्द्र बाजपेयी*
*लखनऊ (उ.प्र.)*
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