माँ को नमन।
माँ कभी है
मातृभूमि,
तो कभी है
वह जननी।
नैनों में बसे
प्यार अपार,
है जो कोमलता
का संसार।
निर्मलता की
है पर्यायवाची,
जो कठिनाई को
भी करे आसानी।
दुविधा जो आये
तो विश्वास भी
वही दिखाए कि
तू अभी हारा नहीं।
है छाँव वो घनी सी
जो धूप तेज़ हो जाए,
तो ममता की लहर सी
रूह को ठंडक पहुँचाए।
माँ है वो औषधि नर्म सी
जो हर ज़ख़्म भर जाए,
फिर भी अपना दर्द
किसी को ना बताए।
है अगर भगवान
स्वर्ग में,
तो उसी के समान
है माँ धरती पे।
मधुलिका मिश्रा
देहरादून, उत्तराखंड
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