शीर्षक :-
मेरी माँ
मेरी माँ है ममता की मूरत ,
देख के तुझे ;
सुकून मिलता है मुझे ,
जब देखता हूँ माँ की सूरत ,
मेरी माँ है वात्सल्य की मूरत ।
कितनी तकलीफ़ सह के -
हर दर्द को हँस के ,
गर्भ में पाला -
किया यमराज से लड़ाई ,
तब जाके मेरी माँ -
मुझे दुनिया दिखाई ।
आज भी है याद बचपन की -
हँसते - रोते माँ के इर्द - गिर्द घुमना ,
कभी माँ से लिपट जाना ,
एक मिठास बचपन की सुधा ,
माँ की आँचल में छुप जाना -
ममता की छाय में , धूप में ,
मुझे तो नज़र आती है ,
देवी , मेरी माँ की रुप में ,
मेरी माँ है ममता की मूरत ।
ममता की देवी है माँ हमारी -
हे माँ ! तेरी पद में तीर्थ - धाम हमारी ,
भक्ति पुष्पों से पूजू -
हे माँ ! पद तुम्हारी ,
मैं प्रति दिन -
स्नेह की क्षुधा रहता हूँ प्रति दिन ,
प्रणय तुझे ना देखूँ -
तेरी दर्शनाभिलाषी हूँ हर दिन ,
तेरी दर्शन से सुकून मिलता है ,
उर में प्रेम पुष्प खिलता है ।
छोटी सी - प्यारी सी ;
एक शब्द है माँ ,
जननी से अनंत ब्रह्माण्ड ,
छोटी सी शब्द -
पर है उत्कृष्ट ,
शब्द है छोटी सी -
छिपी है ममता की सागर ,
माँ से दुनिया ए संसार ।
सुख - दुख की संसार में ,
काँटों से सजे जीवन में ,
माँ फूल बनके खिलती है ,
स्नेह की खुशबू फैलाती है ,
खुद सब कुछ सहके -
बच्चाें को लोरी सुनाती है ,
माँ ही तो है -
संतान की दर्द में आंसू बहाती है ,
माँ ही सर्वोच्च गुरु -
बच्चाें को नेक राह दिखाती है ,
माँ मेरी गुरु , माँ ही ज्ञान ,
माँ को मेरी कोटि - कोटि नमन ।
माँ के बिना संसार लगती है खाली -
माँ के बारे में लिखूँ तो -
कम पड़ जाऐंगे कागज ,
खत्म हो जाऐंगी कलम की काली ।
रतन किर्तनिया
पखांजूर पी व्ही 17 रविन्द्रनगर
जिला :- कांकेर
छत्तीसगढ़
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