शीर्षक, सूनी दहलीज
जब तक मां थी घर में,
आंगन में रंगोली बनती थी।
सुबह शाम घर की दहलीज पर,
घी के दीपक में लौ जलती थी।
तुलसी भी सदैव प्रसन्न रहकर,
हरी-भरी सी खिलती थी।
सूर्य देव को जल चढ़ा कर,
मां को अपार खुशियां मिलती थी।
मंदिर में पूजा की घंटी बजा कर,
मां भजन और कीर्तन करती थी।
घर में छाई रहती थी खुशियां,
मुसीबतें कभी दहलीज पार नहीं करती थी।
मां की वजह से ही घर की,
दहलीज हमेशा सुरक्षित रहती थी।
घर की दहलीज कभी पार न करना,
मां बस हमेशा यही कहती थी।
मां के जाने के बाद अब घर की,
दहलीज सूनी सी लगती है।
सब कुछ पहले जैसा ही है घर में,
पर कुछ कमी सी लगती है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍🏻
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