मां
'मां' ,मां होती है , ममता की खान होती है,
वह महान होती है ।
मां दुनियां जहान होती है,
कर्तव्य पर कुर्बान हाेती है,
मां भगवान होती है।
प्रकृति की अनुकृति और
सृष्टि की मूलाधार होती है मां ।
जहां शब्दों की सीमा समाप्त हो जाए
बस वहीं तो मां होती है।
नहीं है कोई त्यागी तपस्वी मां से बढ़कर
वह करुणा की प्रतिमूर्ति ,महान होती है।
जब गर्भ में पल रहा होता शिशु, तो
आत्म संयम का परिचय देती है,
खान पान पर नियंत्रण रखती है ,
वह मां होती है ।
जब शिशु जन्म ले लेता है तो
दुग्धपान कराने तक भोजन पर
अंकुश रखती , वह मां होती है।
निज इच्छाओं का परित्याग कर
बच्चे का हित अहित ध्यान में रख
जागती- सोती है, वह मां होती है ।
संतान की रूचि -अरूचि का ध्यान रख
पकाती रसोई , खिलाती अलोना -सलोना ,
वह मां होती है ।
अपनी पसंद -नापसंद को ,दरकिनार कर
व्यक्तिगत इच्छाओं की तिलांजलि देकर
परिवार की बलि वेदी पर चढ़ जाती है,
वह मां होती है ।
बच्चों का हंसना -रोना
मां का हंसना रोना है ।
बच्चे को हल्की चोट लग जाने पर भी
जो बेचैन हो जाती है ,वह मां होती है ।
बच्चे की गलती पर डांटती है ,फिर
स्वयं आंसू बहाती है, वह मां होती है ।
परिवार समाज व देश के लिए
जो जीती मरती है ,वह मां होती है।
पहचान लेती है हर दर्द ,खामोशी में भी
वह सिर्फ मां होती है।
तू कण कण में है मां
मेरी नस नस में है मां
धरती भी एक मां है ,कवि भी एक मां है
जिसकी कोख से जन्म लेती है,
एक कविता, वह मां होती है,
जिसे पढ़ सुनकर जन्म लेती है
एक और कविता।
पुत्र पुत्री मां की संतान,
कवि धरती मां की संतान,
कविता कवि की संतान
'कविता' कविता की संतान,
बस मां ही मां है।
मां सचमुच महान होती है,
जहां शब्दों की सीमा समाप्त हो जाए
बस वही तो मां होती है।
डॉ. स्वामीराम बंजारे 'सरल'
विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग
भा. प्र.दे.शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय
कांकेर छत्तीसगढ़
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