नए जमाने के रंग में
पुरानी सी लगती है जो
गिर जाने पर मेरे
दर्द से सिहर उठती जो
मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
सुई में धागा डालने के लिए
हर बार मेरी मनुहार करती है जो
तवे से उतरे गर्म फुल्को में
जाने कितना स्वाद भर देती जो
मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
चश्मे के पीछे आंख गड़ाए
हर चेहरे में मुझे निहारती जो
खिड़की के पीछे टकटकी लगाए
मेरा इंतजार करती है जो
मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
मुझे सुलाती खुद रातों को जागती
चोट लगने पर सिहर उठती जो
अपने आचंल में छिपा कर
हर मुस्किल से बचाती जो
मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
मुझे परदेश भेजकर याद करके पलकें भिंगा लेती है जो
मेरी खुशियों का जीवन का सार
मेरी मुस्कुराहटो की मिठास
मेरी आशाओं का आधार
मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
स्वरचित। कविता
श्री मति नीना श्रीवास्तव
जबलपुर मध्य प्रदेश
११ / ४/ २०२४
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