Friday, April 12, 2024

नीना श्रीवास्तव

नए जमाने  के रंग में 
पुरानी सी लगती है जो
गिर जाने पर मेरे  
दर्द से सिहर  उठती जो 
  मेरी मां हां  मेरी मां ही तो है वो

सुई  में धागा डालने के लिए
हर बार मेरी मनुहार करती है जो
तवे से उतरे गर्म फुल्को में
जाने कितना स्वाद भर देती जो 
  मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो 

चश्मे के पीछे आंख गड़ाए 
हर चेहरे में मुझे निहारती जो
खिड़की के पीछे  टकटकी लगाए
मेरा इंतजार करती है जो
  मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो

मुझे सुलाती खुद रातों को जागती
चोट लगने पर सिहर उठती जो
अपने आचंल में छिपा कर 
हर  मुस्किल से बचाती जो 
 मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
   
मुझे परदेश भेजकर याद करके पलकें भिंगा लेती है जो 
मेरी खुशियों का जीवन का सार
मेरी मुस्कुराहटो की मिठास 
मेरी आशाओं का आधार 
  मेरी मां हां मेरी मां ही तो है वो
     
  स्वरचित। कविता 
श्री मति नीना श्रीवास्तव 
जबलपुर मध्य प्रदेश 
 ११ / ४/ २०२४

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