विधा:- गीत
((ठिकाना))
मैं न जाऊं मथुरा काशी, गंगा नहीं नहाना है।।
मां के ही चरणों में यारों, मेरा ठोर ठिकाना है।।
चरणों में चारों धाम,का है फल मिलता।
करके ए सेवा मां की, ह्रदय मेरा खिलता।।2
सेवा मिली चरणों की, और नहीं चाहना ।
मां के ही चरणों में है,मेरा तो ठिकाना।।
मैं न जाऊं मथुरा काशी...................
करतीं हैं इच्छा पूरी, पूरी मनोकामना।।
चरणों से बढ़ कर मुझे और कोई धाम ना।।
मुझे मेरी मां है प्यारी, मां का मैं दिवाना।
मां के ही चरणों में है,मेरा तो ठिकाना।।
मैं न जाऊं मथुरा काशी...................
स्वरूप की तो केवल मां ही भगवान है।।
सारी दुनियां में न कोई मां के समान है।।
समझे मुझे कोई पागल कहे कोई दिवाना।।
मां के ही चरणों में है,मेरा तो ठिकाना।।
मैं न जाऊं मथुरा काशी...................
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