माँ
माँ ही तो है जननी जग में,
यहाँ माँ ही पालनहार है।
माँ के दम से जीवन संभव,
वरना सब कुछ बेकार है।
इस आँचल की छाँव मिले जब,
जीवन उपवन बन जाता है।
इक इसकी ही आहट से तो,
खंडहर भी घर कहलाता है।
इतनी ताकत इसके श्रम में,
सूरज भी शीश नवाता है।
गोदी माँ की पाने हर युग
ईश्वर धरती पर आता है।
माँ के पैरों की जन्नत में,
यूँ बसती दुनिया सारी है।
माँ शब्द तो छोटा है लेकिन,
पर इसकी महिमा न्यारी है।
माँ का अस्तित्व इस दुनिया में,
सच्चे जीवन का आधार है।
उसके होने से ही जग में,
बनता सुंदर परिवार है।
स्वरचित ✍️
संध्या गुप्ता
पटौदी, गुरूग्राम
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