Monday, April 8, 2024

नीना महाजन नीर

मेरी मां 


दीवार पर 
टंगी तस्वीर में तुम..
और 
इस जहां में मैं.. 
दोनों ही तन्हा हैं मां....

आंखें तलाशती 
तुम्हें हर कोने में.. 
यादें तेरी 
रुलाती हैं...
           
तेरे होने से 
ना था कोई ग़म 
पास थी जब तुम
खुशियों के आकाश
 पर थे हम.. 

किताबों की दुनिया में 
रहती थी गुम
घर के काम में 
ना लगता था मन 

 तब... 
 दूर भागती थी रसोई से मैं
 अब.. 
 दिन सारा वहीं बिताती हूं…. 

जलन हो मिर्ची की 
या कटे उंगली
मुस्कुराती हुई 
दर्द सभी पी जाती हूं... 

करती थी तुमसे 
दर्द के झूठे बहाने
अब
सच्ची तकलीफ़ भी
चुप रह सह जाती हूं..

मेरी आंखों में आंसू देख
तब रोती थी मां मेरे साथ 
अब हर परेशानी, तक़लीफ 
छिपा जाती हूं...

अब आ गई रिश्तों में बनावट 
कहां मेरा वो घर, मेरा आंगन
मां तेरे जाने के बाद 

ढूंढती हूं रिश्तों में अपनापन.. 
पर तुझसी ममता 
ना कहीं मिलती मां..

 ज़िदें फिर लबों पर न आईं 
 खुलकर कभी रो ना पाई
 मां तेरे जाने के बाद..  

सर्दी में ले लेती हूं 
अब गर्म रेशमी शाॅल
पर तेरी गोद सी..
वो गर्माहट ना पाती..

पूरी तो हो गई 
आज हर ख़्वाहिश 
पर तेरे बिना 
ज़िंदगी अधूरी ही पाती..

© नीना महाजन नीर 
गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश

1 comment:

अनिल पांचाल सेवक

*प्रेषित है......*              👇 *मां*👇 *••••गिरावट ना मिलावट....* _____________________________ *दुनिया में कच्चे रंगों वाली सजावट देखी,...