Sunday, April 14, 2024

प्रणव प्रियदर्शी

याद आती है माँ

जब कभी
जिंदगी को बेअदब बोझ समझ
जीने लगता हूँ
और हीनता का शिकार होकर
निराशा के भँवर में फँसने लगता हूँ
याद आती है माँ!
जो नौ महीने तक पूर्ण सजगता से
अपनी संतान का बोझ ढोने में ही
अपने अस्तित्व की गरिमा समझती है।

माँ कभी नहीं कहती
मैं कोई बोझ ढ़ो रही।।

जब कभी
अनचाही परिस्थितियों के
पंजे में पड़कर छटपटाने लगता हूँ
और अपनी पीड़ाओं में 
पिघलकर जमने लगता हूँ
याद आती है माँ!
जो अपने बच्चे को जन्म देते समय
प्रसव की पीड़ा से छटपटाती हुई
वात्सल्य में निमग्न हो जाती है।

माँ कभी नहीं सोचती
मैं “माँ” क्यों बनी।।

जब कभी 
किसी की ललकार
या छोटी-छोटी बातों से चिढ़ने लगता हूँ
और अपनी सहनशीलता से उखड़
आक्रोश में आ जाता हूँ
याद आती है माँ!
जो अपने नवजात बच्चे के
रोने में छिपी ललकार देख
उससे लड़ने नहीं लगती
बल्कि सभी काम छोड़ उसके पास आती है
और चेहरे पर बिना किसी शिकन के
उसे अपनी गोद में समेट लेती है।

माँ कभी नहीं ऊबती 
न ही अपने मातृत्व को कोसती।।

जब कभी 
चारों ओर फैले 
शिकारी जाल में उलझ जाता हूँ
और भूत-भविष्य की चिंता में
रातभर जगा रह जाता हूँ
याद आती है माँ!
जो अपने बेचैन बच्चे के सिरहाने में बैठ
उसे लोरी सुना सुलाया करती है।

माँ कब सोती-कब जाग जाती है
यह सिर्फ वही जानती है।।

- प्रणव प्रियदर्शी
राँची, झारखण्ड
मोबाइल नंबर ः 7903009545, 9905576828
ईमेल ः pranav.priyadarshi.pp@gmail.com

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