माँ
आँख खुली माँ तुझको पाया,
तू पीड़ा से तड़प रही थी,
मुझे अपने सीने से लगायी,
अपनी पीड़ा भूल गयी थी।
शीतल शांत आंचल की छाँव में,
मैं पलता रहा हुआ सयाना,
पापा कहते - खुद कष्ट सहती,
मुझपर तनिक न कष्ट आने देती।
धरा पर सबसे उपर माँ का दर्जा,
युगों से पूजे सब देव-मुनी-नर,
निस्वार्थ भाव से पालन करती,
हर-क्षण चाहती संतान-खुशी वो।
जितने भी जीव इस धरा पर,
सबके माँ होती है निराली,
कोई माता कुमाता नहीं होती,
कुछ पुत्र-कुपुत्र होते बहकावे में।
अन्य रिश्ता पुनः मिल जाए,
माँ का रिश्ता न मिले दुबारा,
उनको कभी रुसवा न करना,
अनन्य पीड़ा सह पाली तुमको।
सृष्टि निर्मात्री शक्ति तेरी अदम्य अपार,
विपत्ति आए संतान भिड़ जाए देव व काल,
तेरी अभिनंदन करू नित्य वंदन,
हे माँ ! आपको शत-शत नमन।
कुमार सुनील नारायण
मधुबनी,बिहार
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