सॉनेट(छन्द)--
!!माँ!!
माँ!भोरकी प्रथम किरण है,
रोज हृदय-प्राची पर आती,
नहीं प्रतीची-ओर बढ़ती है,
रहती प्रेम - धूप बरसाती,
आत्मिकताका गीत सुनाती,
माँ का अंत कभी ना होता,
माँ होती संतति-उर-थाती।
संतति-हित-पथ-जीती रहती,
दाम्पत्य - विष - पीती रहती,
स्वजन हेतु दरिया-सम बहती,
कुहरकुहर कर हर दुख सहती,
माँ जल्दी ना निज दुख कहती।
सिद्ध ना ऐसी-वैसी माता,
होती धरती जैसी माता।
--स्वरचित एवं मौलिक--
राजन कार्तिकाय
हिन्दी शोधप्रज्ञ
पाटलिपुत्र विश्व विद्यालय पटना,बिहार
Rajankan220387@gmail.com
No comments:
Post a Comment