Saturday, April 6, 2024

राजन कार्तिकाय

सॉनेट(छन्द)--

              !!माँ!!

माँ!भोरकी प्रथम किरण है,
रोज  हृदय-प्राची पर आती,
नहीं प्रतीची-ओर  बढ़ती है,
रहती   प्रेम - धूप  बरसाती,
आत्मिकताका गीत सुनाती,
माँ  का अंत कभी ना  होता,
माँ  होती  संतति-उर-थाती।

संतति-हित-पथ-जीती रहती,
दाम्पत्य - विष - पीती   रहती,
स्वजन हेतु  दरिया-सम बहती,
कुहरकुहर कर हर दुख सहती,
माँ जल्दी ना निज दुख कहती।

सिद्ध  ना  ऐसी-वैसी  माता,
होती   धरती   जैसी   माता।

--स्वरचित एवं मौलिक--
राजन कार्तिकाय 
हिन्दी शोधप्रज्ञ
पाटलिपुत्र विश्व विद्यालय पटना,बिहार 
Rajankan220387@gmail.com

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