Monday, April 8, 2024

शालिनी श्रीवास्तव 'सनशाइन '

*मां*
एक अक्षर और दो मात्राएं
जिसमें सारी सृष्टि समाए।
             मां की महिमा हम क्या गाएं
             चरणों में बस शीश झुकाएं।
  मां की ममता,मां की गरिमा  
  स्नेह, त्याग की जो है प्रतिमा ,
              मां की सेवा ही मन्नत है,
              मां की गोदी में जन्नत  है।
   गुरू भी माता ,सखा भी माता,   
   मां का तो हर रूप है भाता।
             मां से ही यह जीवन सुंदर 
             मां की महिमा हर जन गाता।
  मां से ही सीखा है मैंने
  हर मुश्किल से लड़ना, 
             सुख- दुख जीवन की धूप-छांव  
             हर परिस्थित  में खुश रहना।
  जननी से पहचान हमारी,
  पालन करती धरती माता । 
             ज्ञान देती है गुरू माता 
             रक्षा करती देवी माता।
     मेरा गौरव मेरी माता 
     ईश्वर का हर रूप है माता।
              भारत माता के चरणों में ,
              शीश हमारा झुक-झुक जाता।
मां की बात जहां भी आए
स्वयं ईश भी शीश झुकाए,
              मां की ममता का सुख पाने
              राम- कृष्ण  धरती पर आए।
मां होने का अहसास, 
होता है बेहद खास।
        ईश्वर की अनुपम कृति हूँ 
        गर्व मुझे है मैं भी मां हूँ। 

स्वरचित  अप्रकाशित 
शालिनी श्रीवास्तव 'सनशाइन '
गोरखपुर  उत्तर प्रदेश।

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