Saturday, April 13, 2024

सावित्री साहू

माँ
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 नौ महीने तक अपने कोख मे रखती,
प्रसव की असहनीय दर्द सहती।
बच्चें के दुःख दर्द का ख्याल रखती
स्वयं सोती हैं गीले बिस्तर पर, बच्चों को सूखे मे सुलाती
वह होती हैं माँ 

बच्चों को तकलीफ होने पर उनका ह्रदय हैं रोती,
बच्चों की ख़ुशी मे सबसे ज्यादा वह खुश होती।
बच्चों को कष्ट मे देखकर अपने ममता के आंचल मे ढक लेती
वह होती हैं माँ

लल्ला मुन्ना राजा कहकर रूठने पर हैं मनाती
दुलार, पुचकार कर अपने हाथो से एक -एक निवाला खिलाती।
लेती हैं रोज बलैया, बुरी नजर से बचाने काजल टिका रोज लगाती
वह होती हैं माँ

घर आने पर सबसे पहले आँखे हैं जिसे ढूंढ़ती
हर सुख दुःख मे मन जिसे पहले याद करती।
जिसके बिना घर -आंगन सुना -सुना हैं लगती
अपनी दुःख, सुख जिसे पहले बताने को मन करती.
वह होती माँ हैं

रचनाकार 
श्रीमती सावित्री साहू 
          

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